Five friends and a misunderstanding at a haunted hotel - पाँच दोस्त और भूतिया होटल की गलतफहमी

 प्रारंभ – भूतिया होटल में मस्ती की शुरुआत

रमेश, सुरेश, मोहन, राजू और चिंटू — ये पाँचों दोस्त अपनी बेफिक्र ज़िंदगी और मस्तीभरे स्वभाव के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर थे। कॉलेज खत्म होने के बाद उन्होंने तय किया कि अब एक सस्ता और यादगार ट्रिप किया जाए। बजट कम था, लेकिन उत्साह भरपूर। इंटरनेट पर सर्च करते-करते उन्हें एक होटल मिला — “शांति निवास लॉज”, जो इतना सस्ता था कि शक होना लाज़मी था। नीचे लिखा था: “रात में ठहरने वालों के लिए विशेष अनुभव”।

जैसे ही उन्होंने रिव्यू पढ़े, बात साफ हो गई — होटल के बारे में मशहूर था कि वहाँ भूत दिखते हैं। कोई कहता आधी रात को दरवाज़े खुद-ब-खुद खुल जाते हैं, कोई कहता कि दीवारों से आवाज़ें आती हैं। पर पाँचों दोस्तों के लिए ये डर नहीं, बल्कि एंटरटेनमेंट था।

“अरे यार, भूत मिला तो उससे सेल्फी लेंगे,” चिंटू हँसते हुए बोला।

“और इंस्टाग्राम पर डालेंगे – Ghost with Bros,” राजू ने जोड़ा।

हँसी-मज़ाक करते हुए वे होटल पहुँच गए। होटल पुराना था — पीली रोशनी, चरमराती सीढ़ियाँ, और रिसेप्शन पर बैठा एक अजीब-सा मुस्कुराता मालिक। उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“रात में अगर कुछ अजीब हो… तो डरना मत।”

यह सुनकर पाँचों की हँसी और तेज़ हो गई। उन्हें लगा कि यह ट्रिप उनकी ज़िंदगी का सबसे मज़ेदार अनुभव बनने वाला है।


खोज – रात की अजीब आवाज़ें और ‘भूत’ की तलाश

रात करीब बारह बजे सब अपने कमरे में लूडो खेलते हुए हँसी-मज़ाक कर रहे थे, तभी अचानक खट-खट-खट की आवाज़ आई। सब चुप हो गए।

“ये क्या था?” मोहन ने धीरे से पूछा।

अचानक खिड़की के पास से म्याऊँ की आवाज़ आई। रमेश ने परदा हटाया — बाहर एक बिल्ली बैठी थी। सबने राहत की साँस ली।

लेकिन थोड़ी देर बाद फिर घड़-घड़-घड़ की आवाज़ आई, जैसे कोई दीवार के अंदर चल रहा हो। इस बार पाँचों ने तय किया कि भूत खोज अभियान शुरू किया जाए। टॉर्च लेकर वे होटल के गलियारों में निकल पड़े।
एक कमरे से पुराने टीवी की आवाज़ आ रही थी — अपने आप ऑन हो रहा था। राजू डरते-डरते अंदर गया और प्लग निकाला — पता चला कि वायर ढीला था।

फिर बाथरूम के पास से पानी टपकने की आवाज़ आई। सुरेश चिल्लाया, “पक्का भूत नल चला रहा है!”
लेकिन जाँच करने पर पता चला — पाइप लीकेज।

हर जगह डर लगता, और हर जगह वजह निकल आती। फिर भी होटल का माहौल इतना अजीब था कि दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। चिंटू बोला,

“भूत नहीं तो ये होटल ही डरावना है।”

रहस्योद्घाटन – भूतिया होटल का असली सच


सुबह होते-होते पाँचों थक चुके थे। तभी उन्होंने होटल के स्टोररूम में कुछ अजीब सामान देखा — स्पीकर, रस्सियाँ, नकली चेन, और रिमोट कंट्रोल लाइट्स।

“ये सब यहाँ क्यों?” मोहन ने पूछा।

तभी होटल का मालिक वहाँ आ गया और घबराकर बोला,
“अरे… वो… सजावट का सामान है।”

लेकिन सच्चाई ज्यादा देर छुपी नहीं। दबाव डालने पर मालिक ने मान लिया कि होटल भूतिया नहीं है।
असल में वह जानबूझकर आवाज़ें, रोशनी और डरावना माहौल बनाता था ताकि लोग “हॉरर एक्सपीरियंस” के नाम पर आएँ।

“मतलब हम पूरी रात बिल्ली और पाइप से डरते रहे?” राजू गुस्से में बोला।
मालिक बोला, “भाई साहब, बिज़नेस करना पड़ता है।”

पाँचों दोस्त हँसे भी और नाराज़ भी हुए। उन्होंने तय किया कि अब इस आदमी को सबक सिखाया जाएगा।


संघर्ष – मालिक को पकड़ने की मज़ेदार कोशिशें

दोस्तों ने योजना बनाई कि रात को मालिक को रंगे हाथों पकड़ेंगे।
लेकिन हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती।

एक बार रमेश ने मालिक पर जाल फेंका — जाल राजू पर गिर गया।
दूसरी बार चिंटू ने दरवाज़ा बंद किया — खुद अंदर फँस गया।

कभी कोई अंधेरे में डरकर भागता, कभी कोई अपने दोस्त को भूत समझकर चिल्ला देता। होटल पूरा कॉमेडी सर्कस बन चुका था।

सबसे मज़ेदार तब हुआ जब सुरेश ने सफेद चादर ओढ़े मालिक को डराने की कोशिश की और सामने से सच में कोई सफेद साया आ गया। सुरेश बेहोश हो गया।

अब माहौल हँसी से ज़्यादा रहस्यमय हो चुका था।

चरमोत्कर्ष – असली भूत का खुलासा

आधी रात को अचानक ठंडी हवा चली। कमरे की लाइट अपने आप बंद-चालू होने लगी।

तभी एक आवाज़ गूँजी,
“बस बहुत हो गया!”

सब सन्न रह गए। सामने एक बूढ़ी औरत का साया था — आँखें लाल, आवाज़ भारी।
मालिक घुटनों पर गिर गया,
“माँ… माफ कर दो!”

पता चला कि वह मालिक की सास का असली भूत था, जो उसकी धोखेबाज़ी से नाराज़ थी।
वह बोली,
“लोगों को डराकर पैसा कमाना पाप है।”

पाँचों दोस्त पहली बार सच में डर गए — यह कोई ट्रिक नहीं थी।

समापन – सबक, दोस्ती और नई शुरुआत

भूत ने मालिक को चेतावनी दी और हमेशा के लिए गायब हो गया।
मालिक रोते हुए बोला,
“अब कभी गलत काम नहीं करूँगा।”

दोस्तों ने उसकी मदद की — होटल को साफ, ईमानदार और वैध पर्यटन स्थल बना दिया।
अब वहाँ “कॉमेडी हॉरर थीम होटल” खुला — बिना धोखे के।

कुछ महीने बाद वही होटल मशहूर हो गया।
पाँचों दोस्त फिर आए — इस बार बिना डर के, हँसी के साथ।

चिंटू बोला,
“कभी-कभी भूत से ज़्यादा इंसान डरावने होते हैं।”

सब हँस पड़े।
यही थी पाँच दोस्त और भूतिया होटल की गलतफहमी — डर, दोस्ती और सच्चाई की कहानी।