प्रारंभ: रहस्यमय शीशे की शुरुआत
तन्या एक जानी-मानी एंटीक डीलर थी। पुराने और भूले-बिसरे सामानों में उसे अजीब-सी आत्मीयता महसूस होती थी। उसका मानना था कि हर पुरानी चीज़ अपने साथ एक कहानी लेकर आती है।एक दिन, शहर से दूर स्थित एक परित्यक्त हवेली में नीलामी की खबर उसे मिली। हवेली दशकों से बंद थी और लोग कहते थे कि वहाँ कोई रुकता नहीं।धूल, मकड़ी के जाले और सड़ती लकड़ी की गंध के बीच, तन्या की नज़र एक भव्य, दरारों वाला विंटेज शीशा पर पड़ी। उसका फ्रेम काले लकड़ी का था जिस पर अजीब-अजीब आकृतियाँ उकेरी गई थीं—मानो किसी ने दर्द को लकड़ी में कैद कर दिया हो।जैसे ही तन्या शीशे के सामने खड़ी हुई, उसे लगा कि उसका प्रतिबिंब कुछ देर से हिल रहा है। एक ठंडी सिहरन उसकी रीढ़ में दौड़ गई।हवेली का मालिक फुसफुसाते स्वर में बोला,
“इस शीशे को कोई नहीं खरीदता… ये मनहूस है।”
लेकिन तन्या ने मुस्कराकर उसे खरीद लिया। उसे नहीं पता था कि वह सिर्फ एक शीशा नहीं, बल्कि एक बंद दरवाज़ा अपने साथ घर ले जा रही है।
खोज: परछाइयाँ और हवेली का इतिहास
घर पहुँचते ही तन्या ने शीशे को अपने स्टोर में लगाया। रात को जब उसने लाइट बंद की, तब शीशे में हलचल हुई।
परछाइयाँ…
ऐसी परछाइयाँ जो किसी इंसान की नहीं थीं।
अगले कई दिनों तक शीशा उसे बेचैन करता रहा। कभी कोई आकृति, कभी किसी औरत के रोने की आवाज़, कभी हाथ शीशे के अंदर से बाहर निकलते हुए।तन्या ने हवेली के इतिहास की खोज शुरू की। पुराने अख़बारों और रिकॉर्ड्स में उसे एक नाम मिला— अद्विका राय।
तीस साल पहले, उसी हवेली में एक महिला की “आत्महत्या” हुई थी। लेकिन रिपोर्ट्स अधूरी थीं। किसी ने कहा था कि उसे पागल घोषित कर दिया गया था, किसी ने कहा कि वह सच्चाई जान गई थी।
और सबसे डरावनी बात— उसकी मौत के बाद हवेली में लगे सभी शीशे टूट गए थे… सिवाय उस एक शीशे के।
रहस्योद्घाटन: आत्मा और पोर्टल
एक रात, शीशे में तन्या को एक औरत साफ़ दिखाई दी। उसकी आँखों में दर्द था, गला कटा हुआ, और होंठ काँप रहे थे।“मुझे आज़ाद करो…”
तन्या बेहोश हो गई।
जब उसे होश आया, तो उसका शरीर कमज़ोर था। शीशा अब उसे थका हुआ, खाली महसूस कराने लगा। जैसे उसकी ऊर्जा कोई चूस रहा हो।
एक तांत्रिक ने उसे सच बताया—
“ये शीशा एक आत्मिक पोर्टल है। इसमें एक निर्दोष आत्मा क़ैद है, जिसकी हत्या को आत्महत्या बताया गया।”
आत्मा अपनी सच्चाई सामने लाने के लिए किसी ज़िंदा इंसान की ऊर्जा लेती है।
और अब… वो आत्मा तन्या को चुन चुकी थी।
संघर्ष: आत्मा बनाम जीवन
हर रात आत्मा तन्या को शीशे में खींचने लगी।उसका प्रतिबिंब अब मुस्कराने लगा था, जबकि असली तन्या रो रही थी।
उसने शीशा ढक दिया—आवाज़ें और तेज़ हो गईं।
शीशा तोड़ा—दरारें खुद भर गईं।
आत्मा बोली— “अगर तू मेरी सच्चाई नहीं बताएगी, तो तू मेरी जगह ले लेगी।”
तन्या की उंगलियाँ नीली पड़ने लगीं। उसकी परछाईं अब उससे अलग चलने लगी थी।
वह जान चुकी थी— भागना अब विकल्प नहीं था
चरमोत्कर्ष: सच की कीमत
तन्या ने अद्विका की फाइलें सार्वजनिक कीं। उसने साबित किया कि अद्विका की हत्या उसके पति और हवेली के वारिस ने की थी, ताकि उसकी संपत्ति हड़प सकें।जैसे ही सच्चाई सामने आई— शीशा ज़ोर से काँपा।
आत्मा चीखी… और तन्या के शरीर में प्रवेश कर गई।
लेकिन दर्द के उस पल में, आत्मा मुस्कराई— “अब मैं मुक्त हूँ।”
शीशा ज़मीन पर गिरकर टूट गया।
समापन: डर जो रह गया
सुबह सब शांत था। शीशा अब एक साधारण टूटा हुआ काँच था।तन्या बच गई… लेकिन बदल चुकी थी।
आज वह सामान्य जीवन जीती है। एंटीक स्टोर अब बंद है।
और सबसे अजीब बात—
वह किसी भी शीशे में अपना प्रतिबिंब देखने से डरती है।
क्योंकि कभी-कभी…
शीशे हमें वो दिखाते हैं, जो मर चुका होता है… या मरना चाहता है।
