एक दिन गाँव में एक अजीब बीमारी फैलने लगी। कई लोग बीमार पड़ गए, बच्चे कमज़ोर होने लगे और वैद्य की दवाइयाँ बेअसर साबित हो रही थीं। उसी दौरान मीरा ने अपनी दादी से एक पुरानी कथा सुनी—पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर एक दुर्लभ जड़ी-बूटी उगती है, जो किसी भी गंभीर बीमारी को जड़ से ठीक कर सकती है। दादी ने यह भी बताया कि वर्षों पहले कोई उस चोटी तक गया था, लेकिन रास्ता बेहद कठिन और खतरनाक है। मीरा के मन में एक विचार बिजली की तरह कौंधा—अगर वह जड़ी-बूटी ले आए, तो पूरा गाँव बच सकता है। लोगों ने उसे फिर रोका, डराया, और कहा कि यह उसके बस की बात नहीं। लेकिन मीरा के लिए यह सिर्फ जड़ी-बूटी की खोज नहीं थी; यह अपने अस्तित्व, अपने आत्मसम्मान और अपने सपनों की खोज थी। उसने मन ही मन ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो, वह पहाड़ की चोटी तक जाएगी।
मीरा के इस साहसिक निर्णय की खबर गाँव के एक बुजुर्ग तक पहुँची, जिन्हें लोग “बाबा हरिदत्त” कहते थे। वे कभी मशहूर पर्वतारोही रह चुके थे, लेकिन उम्र और अकेलेपन ने उन्हें गुमनामी में धकेल दिया था। मीरा जब उनसे मिलने पहुँची, तो उन्होंने उसकी आँखों में वही जुनून देखा, जो कभी उनके भीतर हुआ करता था। बाबा हरिदत्त ने मीरा की मदद करने का फैसला किया। उन्होंने उसे पहाड़ चढ़ने की बुनियादी तकनीकें सिखाईं—संतुलन बनाना, साँसों पर नियंत्रण रखना, और डर से दोस्ती करना। उन्होंने लकड़ी और हल्के धातु से एक खास बैसाखी बनाई, जो सामान्य बैसाखी से कहीं मजबूत और हल्की थी। यह प्रशिक्षण केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि मानसिक भी था। बाबा उसे सिखाते थे कि असली ताकत पैरों में नहीं, बल्कि हौसले में होती है। मीरा हर दिन खुद को पहले से ज्यादा मजबूत महसूस करने लगी।
पहला प्रयास मीरा के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। जैसे-जैसे वह ऊपर चढ़ती गई, रास्ता संकरा और फिसलन भरा होता गया। अचानक मौसम ने करवट ली—तेज़ हवा, घने बादल और ठंडी बारिश ने हालात बिगाड़ दिए। एक गलत कदम उसकी जान ले सकता था। मजबूरन उसे वापस लौटना पड़ा। गाँव लौटते ही कुछ लोगों ने उस पर तंज कसे—“देखा, हमने कहा था न?” किसी ने कहा कि उसने गाँव का समय और संसाधन बर्बाद कर दिए। ये शब्द मीरा के दिल में चुभे, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उस रात वह रोई जरूर, पर उसकी आँखों के आँसू अगले दिन फिर से साहस में बदल गए। उसने समझ लिया कि असफलता अंत नहीं, बल्कि तैयारी का हिस्सा होती है।
दूसरे प्रयास में मीरा पहले से ज्यादा सतर्क और दृढ़ थी। आधे रास्ते में एक चट्टान पर चढ़ते समय उसकी एक बैसाखी टूट गई। पल भर के लिए मौत सामने खड़ी थी। नीचे गहरी खाई और ऊपर खड़ी चट्टान—कोई मदद नहीं। लेकिन मीरा ने अपने डर को काबू में किया। उसने दूसरी बैसाखी और अपने हाथों के सहारे आगे बढ़ना शुरू किया। एक खतरनाक मोड़ पर उसका पैर फिसल गया, शरीर झूल गया, लेकिन उसने पूरी ताकत से चट्टान को पकड़ लिया। उस पल उसे अपने सारे ताने, सारी हँसी और सारे संदेह याद आए—और उसी याद ने उसे और मजबूत बना दिया। घंटों की संघर्षपूर्ण चढ़ाई के बाद, आखिरकार वह पहाड़ की चोटी पर पहुँच गई। वहाँ सूरज की रोशनी में चमकती वह दुर्लभ जड़ी-बूटी जैसे उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।
मीरा जब जड़ी-बूटी लेकर गाँव लौटी, तो पूरा दृश्य बदल चुका था। जिन लोगों ने उसका मजाक उड़ाया था, उनकी आँखों में गर्व और सम्मान था। जड़ी-बूटी से बीमार लोग धीरे-धीरे ठीक होने लगे और गाँव में फिर से रौनक लौट आई। मीरा की कहानी दूर-दूर तक फैल गई—एक कमजोर पैर वाली लड़की की कहानी, जिसने मजबूत इरादों से पहाड़ को जीत लिया। उसे क्षेत्रीय स्तर पर सम्मान मिला, लेकिन मीरा के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार यह था कि अब गाँव की हर छोटी बच्ची अपनी सीमाओं से डरती नहीं थी। “छोटी चिड़िया, बड़ी उड़ान” सिर्फ एक कहानी नहीं रही; यह साहस, दृढ़ता और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई, जो हर उस इंसान को प्रेरित करती है, जो हालात से लड़कर अपने सपनों को पंख देना चाहता है।
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