The last guardian of light - प्रकाश का अंतिम रक्षक

प्रारंभ

उजियारपुर नाम का वह गांव अपने नाम की तरह ही कभी उजास से भरा रहता था। सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, तो गेहूं की बालियाँ सोने की तरह चमक उठतीं और शाम को दीयों की पंक्तियाँ पूरे गांव को तारे-जैसा बना देतीं। लेकिन उस वर्ष कुछ बदल गया। एक अजीब-सी ठंडक हवा में घुलने लगी, सूरज देर से निकलता और जल्दी डूब जाता, और रातें असहनीय रूप से लंबी होने लगीं। लोग इसे मौसम का फेर समझते रहे, पर धीरे-धीरे उजियारपुर पर ऐसा अंधेरा छाने लगा जो केवल आंखों से नहीं, मन से भी रोशनी छीन रहा था। इसी गांव में रहता था अनिरुद्ध—एक साधारण-सा युवा चरवाहा, जो भेड़ों के साथ पहाड़ियों पर घूमता और सितारों से बातें करता। एक रात, जब अंधेरा कुछ ज़्यादा ही गाढ़ा था, अनिरुद्ध ने पहाड़ी की गुफा के पास एक अनोखी चमक देखी। वह कोई साधारण रोशनी नहीं थी; वह ऐसी थी जैसे सूरज की कोई भूली हुई किरण धरती पर उतर आई हो। उत्सुकता और भय के बीच झूलते हुए अनिरुद्ध ने उस चमक को छुआ, तो उसकी हथेली में एक प्रकाश-क्रिस्टल आ गया—गर्म, जीवंत और धड़कता हुआ। उसी क्षण उसे लगा मानो किसी ने उसके भीतर जिम्मेदारी का दीप जला दिया हो, हालांकि वह अभी यह नहीं जानता था कि यह रोशनी उसके जीवन को हमेशा के लिए बदलने वाली है।



खोज

अगले दिन अनिरुद्ध उस क्रिस्टल को गांव के बुजुर्गों के पास ले गया। सबसे वृद्ध पुजारी, जिनकी आंखों ने सदियों के किस्से देखे थे, उस क्रिस्टल को देखते ही कांप उठे। उन्होंने बताया कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि सूर्यदेव का अवशेष है—वह प्रकाश, जो कभी संसार में संतुलन बनाए रखता था। किंवदंती थी कि जब अंधकार अपनी सीमा लांघने लगे, तब सूर्यदेव अपने प्रकाश का एक अंश धरती पर भेजते हैं, ताकि कोई योग्य आत्मा उसे संभाल सके। उसी समय पुजारी ने एक और नाम लिया—“छायामार।” यह वही शक्ति थी, जो धीरे-धीरे उजियारपुर पर अंधेरे की चादर बिछा रही थी। कहा जाता था कि छायामार अंधकार का स्वामी नहीं, बल्कि उसका कैदी है। अनिरुद्ध के मन में डर तो था, लेकिन उससे कहीं अधिक था गांव को बचाने का संकल्प। उसने तय किया कि वह छायामार के स्रोत तक जाएगा, चाहे रास्ता कितना ही खतरनाक क्यों न हो। यात्रा में उसके साथ जुड़ गया एक बुद्धिमान उल्लू—जो रात की आंखों से सच देख सकता था—और एक बहादुर किसान, जिसने अपने खेतों को अंधेरे में मरते देखा था। तीनों ने मिलकर यह खोज शुरू की कि अंधेरे की जड़ क्या है और उसे कैसे रोका जा सकता है।

रहस्योद्घाटन

घने जंगलों, भूले हुए मंदिरों और समय से परे घाटियों को पार करते हुए वे एक प्राचीन खंडहर तक पहुंचे। वहीं उन्हें पता चला कि छायामार कोई जन्मजात राक्षस नहीं था। वह कभी एक रक्षक आत्मा हुआ करता था, जिसे देवताओं ने अंधकार और प्रकाश के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी दी थी। लेकिन एक देवता की ईर्ष्या और धोखे ने उसे अंधेरे में धकेल दिया। प्रकाश से वंचित होकर उसकी आत्मा टूट गई, और वही पीड़ा धीरे-धीरे क्रोध में बदल गई। उल्लू ने अपनी गंभीर आवाज़ में कहा, “जिसे प्रकाश से वंचित किया जाए, वह अंधेरे से मित्रता कर लेता है।” अनिरुद्ध को पहली बार एहसास हुआ कि यह युद्ध केवल तलवार और शक्ति का नहीं, बल्कि करुणा और समझ का भी है। उसे बताया गया कि छायामार को नष्ट नहीं किया जा सकता; उसे केवल मुक्त किया जा सकता है—उस धोखे और पीड़ा से, जिसने उसे राक्षस बना दिया। इसके लिए आवश्यक था सूर्यदेव का क्रिस्टल और एक प्राचीन मंत्र, जो केवल शुद्ध हृदय वाला ही बोल सकता था।

संघर्ष

जैसे ही वे छायामार की गुफा के पास पहुंचे, अंधेरा जीवित-सा हो उठा। काली लपटें हवा में लहराईं और छायामार ने गर्जना की। उसका स्वर पीड़ा और क्रोध से भरा था। उसने अनिरुद्ध पर हमला किया, मानो उसकी रोशनी उसे जला रही हो। किसान ने अपने साहस से रास्ता रोका, उल्लू ने दिशा दिखाई, लेकिन छायामार की शक्ति अपार थी। हर वार के साथ अंधेरा और गाढ़ा होता गया। अनिरुद्ध के भीतर भी भय ने जगह बनानी शुरू कर दी, पर जैसे ही उसने क्रिस्टल को कसकर पकड़ा, उसे उजियारपुर के बच्चों की हंसी, खेतों की हरियाली और दीयों की रोशनी याद आई। उसने समझ लिया कि यह लड़ाई जीतने के लिए उसे अपने डर को नहीं, अपने विश्वास को आगे रखना होगा। संघर्ष के बीच अनिरुद्ध घायल हुआ, लेकिन उसके कदम नहीं रुके। उसने देखा कि छायामार की आंखों में राक्षसी क्रूरता के साथ-साथ गहरी उदासी भी है—एक ऐसी उदासी, जिसे केवल प्रकाश ही भर सकता है।

चरमोत्कर्ष

अंततः वह क्षण आया, जब सब कुछ दांव पर था। अनिरुद्ध छायामार के सामने खड़ा हुआ, क्रिस्टल उसकी हथेली में धधक रहा था। उसने वह मंत्र बोलना शुरू किया, जिसे सदियों से कोई नहीं बोला था। शब्दों के साथ प्रकाश फैलने लगा और अंधेरा सिकुड़ने लगा। छायामार चीखा, पर वह चीख दर्द की नहीं, मुक्ति की थी। अंतिम साहस जुटाकर अनिरुद्ध ने क्रिस्टल को छायामार के हृदय में धकेल दिया। एक विस्फोट-सा हुआ—पर विनाश का नहीं, उजास का। अंधेरा टूटकर प्रकाश में बदलने लगा, और छायामार की आकृति धीरे-धीरे एक शांत, उजली आत्मा में बदल गई। उसकी आंखों में अब क्रोध नहीं, कृतज्ञता थी। उसने अनिरुद्ध को नमन किया, मानो कह रहा हो—“तुमने मुझे नहीं हराया, मुझे बचाया।”

समापन

उजियारपुर पर छाया अंधेरा उस दिन हमेशा के लिए मिट गया। सूरज पहले से अधिक तेज़ चमकने लगा, और रातें फिर से तारों से भर गईं। गांव के बीचोंबीच वह क्रिस्टल स्थापित किया गया, जो अब केवल शक्ति का स्रोत नहीं, बल्कि याद दिलाने वाला प्रतीक था—कि प्रकाश केवल बाहर नहीं, भीतर भी होता है। अनिरुद्ध को गांव का संरक्षक माना गया, पर वह खुद को नायक नहीं, सेवक मानता रहा। वह जानता था कि सच्चा प्रकाश दूसरों को हराने में नहीं, उन्हें समझने और मुक्त करने में है। उजियारपुर फिर से उजियारपुर बन गया—लेकिन अब उसकी रोशनी केवल दीयों और सूरज से नहीं, बल्कि करुणा और साहस से आती थी।


सीख :-

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हर अंधेरे के पीछे कोई न कोई पीड़ा छिपी होती है। सच्चा साहस केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समझ, करुणा और विश्वास से आता है। जब हम किसी समस्या या व्यक्ति को नष्ट करने के बजाय उसे समझने और सुधारने का प्रयास करते हैं, तभी स्थायी उजाला फैलता है।