“हाँ भाई?” विक्रम ने शोर के बीच कहा।
“कहाँ तक पहुँचा?” रोहित ने पूछा।
“यार बारिश बहुत तेज है, पुल के पास हूँ। लगता है कहीं रुक जाऊँ।”
रोहित ने हँसते हुए कहा, “अरे बस थोड़ी दूर है, निकल ले। तू तो शेर है, इतनी सी बारिश से डर गया?”
विक्रम ने भी हँसते हुए कहा, “ठीक है, निकलता हूँ।”
फोन कट गया।
कुछ ही देर बाद रोहित के दरवाजे पर पुलिस आई। पास की नदी का पुराना पुल तेज बारिश में टूट गया था। कई गाड़ियाँ बह गई थीं। उनमें एक बाइक भी थी—विक्रम की। नदी उफान पर थी। कई दिन तलाश हुई, मगर विक्रम का शव नहीं मिला। अंतिम संस्कार में खाली चिता जलाई गई। विक्रम की माँ बेसुध हो गई थीं। रोहित की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने चिता के सामने खड़े होकर फुसफुसाया—
“विक्रम, मैंने तुझे मरने दिया। माफ कर देना।”
उस रात रोहित को नींद नहीं आई। आधी रात को उसे सपना आया। काली नदी के किनारे विक्रम खड़ा था। भीगा हुआ। उसकी आँखें अजीब थीं। उसने धीमे स्वर में कहा—
“मैं वापस आऊँगा… तुझसे मिलने।”
रोहित चीखते हुए उठ बैठा। खिड़की खुली थी। बाहर बारिश रुक चुकी थी… लेकिन उसके कमरे के फर्श पर पानी की हल्की बूंदें थीं।
एक महीना बीत गया। रोहित की जिंदगी सामान्य दिखने लगी, लेकिन भीतर से वह टूट चुका था। उसे हर वक्त लगता कोई उसे देख रहा है। रात को अक्सर उसकी नींद अचानक खुल जाती। कमरे की खिड़की खुली मिलती, जबकि वह उसे सोने से पहले बंद करता था। अजीब बात यह थी कि बारिश न होने पर भी खिड़की के नीचे पानी के छींटे दिखाई देते। एक रात उसने हिम्मत करके लाइट जलाई। उसके दिल की धड़कन रुक गई। बिस्तर के पास फर्श पर गीले पैरों के निशान थे—मानो कोई अभी-अभी नदी से निकलकर आया हो। निशान दरवाजे तक जाते थे, मगर दरवाजा अंदर से बंद था। रोहित के मन में भय और अपराधबोध की लहरें उठने लगीं। उसे याद आया, विक्रम को बारिश में भीगना कितना पसंद था। वह कहता था, “बारिश में भीगकर ऐसा लगता है जैसे सारी परेशानियाँ धुल गईं।” लेकिन अब ये बारिश सुकून नहीं, डर लेकर आ रही थी।
रोहित ने खुद को समझाने की कोशिश की—शायद ये उसका भ्रम है। शायद उसका अपराधबोध ही ये सब दिखा रहा है। मगर हर रात वही घटनाएँ दोहराई जातीं। कभी अलमारी से पानी टपकता, कभी दीवार पर गीली हथेली का निशान दिखाई देता। उसका डर अब पागलपन में बदलने लगा था।
आखिरकार रोहित ने तय किया कि वह विक्रम के घर जाएगा। विक्रम की माँ उसे देखकर रो पड़ीं। घर में अभी भी विक्रम की हँसी की गूँज जैसे कैद थी। बातों-बातों में विक्रम की माँ ने कहा, “उस रात उसने तुझे फोन किया था ना? वो रुकना चाहता था… पर तूने कहा निकल ले।”
रोहित का सिर झुक गया।
फिर माँ अंदर गईं और एक पुरानी डायरी लेकर आईं। “ये उसकी डायरी है। शायद तुम्हें पढ़नी चाहिए।”
रोहित ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे। आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“अगर मैं कभी मर जाऊँ, तो रोहित से कहना कि मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगा। मैं वापस आऊँगा… और उसे अपने साथ ले जाऊँगा।”
रोहित के शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसे वही सपना याद आया। वही शब्द।
क्या ये सब संयोग था? या सच में विक्रम लौट रहा था?
उस रात रोहित ने घर के सारे ताले बदल दिए। खिड़कियाँ बंद कर दीं। दरवाजों पर मोटी कुंडियाँ लगा दीं। उसने खुद से कहा—अब कुछ नहीं होगा। लेकिन आधी रात को बादल फिर गरजे। बारिश शुरू हो गई।
धीरे-धीरे उसने देखा—दरवाजे की दरारों से पानी रिस रहा है। पानी फर्श पर फैलने लगा। कुछ ही मिनटों में कमरा तालाब जैसा लगने लगा। अचानक बिजली चली गई। अंधेरा छा गया।
रोहित की साँसें तेज हो गईं। जब बिजली लौटी, तो उसके सामने कोई खड़ा था।
विक्रम।
पूरा भीगा हुआ। आँखों से पानी बह रहा था। उसके कपड़ों से नदी की मिट्टी टपक रही थी।
“तूने मुझे मरने दिया,” उसने धीमे स्वर में कहा। “अब मैं तुझे लेने आया हूँ।”
रोहित घुटनों पर गिर पड़ा।
“विक्रम, मैंने गलती की। मुझे माफ कर दे। मैं तेरी माँ की देखभाल करूंगा। तेरे सपने पूरे करूंगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विक्रम की आत्मा कुछ पल रुकी।
“वादा करता है?”
“हाँ, मैं वादा करता हूँ।”
विक्रम ने कहा—
विक्रम की आत्मा कुछ पल रुकी।
“वादा करता है?”
“हाँ, मैं वादा करता हूँ।”
विक्रम ने कहा—
“ठीक है। लेकिन याद रखना… अगर तूने वादा तोड़ा, तो मैं सच में लौट आऊँगा।”
अचानक सब गायब हो गया। पानी भी। अंधेरा भी।
रोहित अकेला खड़ा था—भीगा हुआ, काँपता हुआ।
उस रात के बाद रोहित बदल गया। उसने विक्रम की माँ को अपने साथ रखा। उनकी हर जरूरत का ध्यान रखा। विक्रम के सपनों को सच करने के लिए उसने अपनी नौकरी छोड़ी और समाज सेवा में लग गया।
विक्रम हमेशा एक स्कूल खोलना चाहता था—ऐसा स्कूल जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले। रोहित ने कई सालों की मेहनत के बाद विक्रम के नाम पर स्कूल खोला।
उद्घाटन के दिन बारिश हो रही थी। रोहित ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे कहीं से एक आवाज आई—
“वादा निभाया तूने…”
उस दिन के बाद रोहित को कभी गीले पैरों के निशान नहीं दिखे।
दस साल बाद रोहित उसी पुल के पास गया जहाँ विक्रम की जान गई थी। पुल अब नया बन चुका था। नदी शांत थी।
वहाँ एक पत्थर पर खुदा था—
“मुझे माफ कर दिया… अब मैं शांति में हूँ।”
रोहित की आँखें भर आईं।
उस दिन के बाद बारिश उसके लिए डर नहीं, सुकून बन गई।
लोग कहते हैं, जब भी सावन की पहली बारिश होती है, उस पुल के पास हल्की सी आवाज गूँजती है—
“वादा निभाया तूने… धन्यवाद।”
और शायद यही सच है—
अचानक सब गायब हो गया। पानी भी। अंधेरा भी।
रोहित अकेला खड़ा था—भीगा हुआ, काँपता हुआ।
उस रात के बाद रोहित बदल गया। उसने विक्रम की माँ को अपने साथ रखा। उनकी हर जरूरत का ध्यान रखा। विक्रम के सपनों को सच करने के लिए उसने अपनी नौकरी छोड़ी और समाज सेवा में लग गया।
विक्रम हमेशा एक स्कूल खोलना चाहता था—ऐसा स्कूल जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिले। रोहित ने कई सालों की मेहनत के बाद विक्रम के नाम पर स्कूल खोला।
उद्घाटन के दिन बारिश हो रही थी। रोहित ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे कहीं से एक आवाज आई—
“वादा निभाया तूने…”
उस दिन के बाद रोहित को कभी गीले पैरों के निशान नहीं दिखे।
दस साल बाद रोहित उसी पुल के पास गया जहाँ विक्रम की जान गई थी। पुल अब नया बन चुका था। नदी शांत थी।
वहाँ एक पत्थर पर खुदा था—
“मुझे माफ कर दिया… अब मैं शांति में हूँ।”
रोहित की आँखें भर आईं।
उस दिन के बाद बारिश उसके लिए डर नहीं, सुकून बन गई।
लोग कहते हैं, जब भी सावन की पहली बारिश होती है, उस पुल के पास हल्की सी आवाज गूँजती है—
“वादा निभाया तूने… धन्यवाद।”
और शायद यही सच है—
कुछ दोस्ती मौत से भी बड़ी होती है।
दोस्ती में लिया गया एक छोटा फैसला भी जीवन बदल सकता है।
अपराधबोध इंसान को अंदर से तोड़ देता है, लेकिन प्रायश्चित उसे नया जीवन दे सकता है।
वादा निभाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। सच्चा पश्चाताप आत्मा को भी शांति दे सकता है।
कहानी की सीख :-
दोस्ती में लिया गया एक छोटा फैसला भी जीवन बदल सकता है।
अपराधबोध इंसान को अंदर से तोड़ देता है, लेकिन प्रायश्चित उसे नया जीवन दे सकता है।
वादा निभाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। सच्चा पश्चाताप आत्मा को भी शांति दे सकता है।
