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समय बीतता गया, लेकिन सास का व्यवहार नहीं बदला। सावित्री देवी को लगता था कि बहू को सख्ती से ही संभाला जा सकता है। उन्हें अपने पुराने समय की याद आती थी, जब उन्होंने भी अपनी सास के साथ कठिन जीवन जिया था। इसलिए वे सोचती थीं कि बहू को भी वही सब सहना चाहिए। लेकिन वे यह भूल गई थीं कि समय बदल चुका है। रीमा का दिल धीरे-धीरे टूट रहा था। वह घर के हर काम में परफेक्ट बनने की कोशिश करती, फिर भी उसे सराहना नहीं मिलती। एक दिन, रीमा ने गलती से खाना थोड़ा नमकीन बना दिया। बस फिर क्या था, सावित्री देवी ने उसे सबके सामने डांट दिया। उस दिन रीमा का दिल पूरी तरह टूट गया। उसने खुद से सवाल किया—क्या वह कभी इस घर का हिस्सा बन पाएगी? क्या उसे कभी मां जैसा प्यार मिलेगा?
एक दिन ऐसा आया जब रीमा बीमार पड़ गई। तेज बुखार के कारण वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। घर का सारा काम ठप पड़ गया। उस दिन सावित्री देवी को पहली बार एहसास हुआ कि रीमा के बिना घर कितना खाली और अस्त-व्यस्त हो गया है। उन्होंने खुद काम करने की कोशिश की, लेकिन जल्दी ही थक गईं। तभी उन्हें याद आया कि रीमा रोज बिना शिकायत सब कुछ संभालती थी। उन्होंने धीरे से रीमा के कमरे में जाकर देखा—वह कमजोर और थकी हुई नजर आ रही थी। उस पल सावित्री देवी के दिल में कुछ बदलने लगा। उन्होंने पहली बार रीमा के सिर पर हाथ रखा और कहा, "तू आराम कर, मैं सब संभाल लूंगी।" यह सुनकर रीमा की आंखों में आंसू आ गए—यह पहली बार था जब उसकी सास ने उससे प्यार से बात की थी।
रीमा के बीमार होने के बाद सावित्री देवी ने घर के कामों की जिम्मेदारी संभाली। धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि घर चलाना कितना मुश्किल होता है। उन्होंने महसूस किया कि रीमा कितनी मेहनत करती थी, फिर भी कभी शिकायत नहीं करती थी। इस दौरान उन्होंने अपने पुराने व्यवहार पर विचार किया। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपनी बहू के साथ वही किया जो कभी उनके साथ हुआ था। लेकिन क्या यह सही था? क्या दर्द का बदला दर्द से लेना चाहिए? यह सवाल उनके दिल को झकझोरने लगा। एक दिन उन्होंने रीमा से माफी मांगने का फैसला किया। जब रीमा ठीक हुई, तो सावित्री देवी उसके पास गईं और कहा, "मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे कभी समझा ही नहीं।"
रीमा यह सुनकर हैरान रह गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी सास उससे माफी मांगेंगी। उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उसने तुरंत अपनी सास को गले लगा लिया। उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। सावित्री देवी अब रीमा को बेटी की तरह मानने लगीं। वे उसकी मदद करतीं, उसकी तारीफ करतीं और हर छोटी-छोटी खुशी में उसका साथ देतीं। रीमा भी अपनी सास का पूरा सम्मान करती और उन्हें खुश रखने की पूरी कोशिश करती। अब घर में प्यार, हंसी और अपनापन था। दोनों के बीच का रिश्ता सास-बहू का नहीं, बल्कि मां-बेटी का बन गया था।
इस कहानी का सबसे सुंदर पहलू यह है कि बदलाव हमेशा संभव होता है। अगर इंसान अपने दिल को खोलकर देखे, तो वह अपने रिश्तों को बेहतर बना सकता है। सावित्री देवी ने यह साबित कर दिया कि प्यार और समझदारी से हर रिश्ता सुधर सकता है। रीमा की सहनशीलता और प्यार ने आखिरकार उसकी सास का दिल बदल दिया। यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्तों में प्यार, धैर्य और समझ बहुत जरूरी होते हैं। अगर हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें, तो हर घर खुशियों से भर सकता है।