प्रारंभ – दैनिक जीवन: कॉमेडी का असली मंच
कमलादेवी के लिए सुबह की शुरुआत सूरज से पहले होती थी। पूजा की थाली, तुलसी को पानी, और फिर रसोई में खनकती चूड़ियों के साथ दिन का पहला ताना—“आज फिर ब्रेड?” दूसरी तरफ आयशा, जो देर रात तक नेटफ्लिक्स पर सीरीज़ देखती थी, सुबह मोबाइल अलार्म को पाँच बार स्नूज़ करके उठती। एक ही घर में दो पीढ़ियाँ, दो सोच, दो लय—और टकराव इतने नियमित कि वे झगड़े नहीं, स्किट लगने लगे थे। कमलादेवी को लगता आयशा “घर को होटल समझती है”, और आयशा को लगता सास “हर बात में संस्कार का हथौड़ा” चला देती हैं। इन सबके बीच राहुल—पति, बेटा, और अनजाने में निर्देशक—मोबाइल कैमरा ऑन कर देता। “माँ, वही स्वेटर-नेटफ्लिक्स वाली बात फिर से बोलना,” वह हँसते हुए कहता।धीरे-धीरे ये वीडियो रिश्तेदारों तक पहुँचे, फिर दोस्तों तक, और फिर अजनबियों तक। कमेंट्स आने लगे—“ये तो बिल्कुल मेरी सास जैसी हैं!” “ये बहू नहीं, हम सब हैं!” घर की खटपट अब लाखों घरों की कहानी बन चुकी थी। एक शाम, जब कमलादेवी गैस बंद करना भूलने पर आयशा को भाषण दे रही थीं और आयशा जवाब में फूड डिलीवरी ऐप खोल रही थी, तभी राहुल का फोन बजा। उधर से आवाज़ आई—लोकल कॉमेडी क्लब का प्रमोटर। “आपका फैमिली फ्यूड्स कंटेंट धमाल है। लाइव स्टैंड-अप बैटल करेंगे?” दोनों औरतें हँस पड़ीं। “हम?” लेकिन जाते-जाते प्रमोटर का वाक्य चुभ गया—“वैसे भी, आप लोग तो घर तक ही सीमित हैं न?” वही वाक्य चुनौती बन गया।
खोज – प्रैक्टिस: दो दुनियाओं का टकराव
चुनौती स्वीकार करने के बाद घर दो अलग-अलग ट्रेनिंग ज़ोन में बँट गया। कमलादेवी ने अपने किट्टी पार्टी ग्रुप को बुलाया। गोल घेरे में बैठी सहेलियाँ, चाय-नमकीन, और तालियों की आवाज़। कमलादेवी अपनी शिकायतों को पुराने लोकगीतों की धुन पर ढाल देतीं—“आजकल की बहुएँ पूछे बिना ऐप खोल लेती हैं…” सहेलियाँ ठहाके लगातीं। उधर आयशा अपने कमरे में लैपटॉप लगाए बैठी थी। यूट्यूब ट्यूटोरियल, रील्स, ट्रेंडिंग मीम्स, हैशटैग—सब कुछ नोटबुक में। वह अपने दोस्तों को व्हाट्सऐप पर जोक्स भेजती—“ज़रा रिव्यू दो, ये ज़्यादा हार्श तो नहीं?”दोनों एक-दूसरे की तैयारी पर नज़र रखे हुए थीं। कमलादेवी को लगता आयशा “चुरा” लेगी, और आयशा को डर कि सास “भावनात्मक कार्ड” खेल जाएँगी। कई बार एक का जोक दूसरे की प्रैक्टिस में घुस जाता, और गलतफहमी पैदा होती। राहुल अब सिर्फ बेटा नहीं रहा—वह मैनेजर, टाइम-कीपर और प्रॉम्प्टर बन गया। “माँ, पंचलाइन के बाद पॉज़,” “आयशा, यहाँ आवाज़ नीचे रखो।” घर किसी कॉमेडी अकैडमी जैसा लगने लगा, जहाँ टकराव भी हँसी में बदल रहा था।
रहस्योद्घाटन – असली चिंता का पर्दाफाश
बैटल से एक रात पहले हँसी गायब हो गई। कमलादेवी अकेली बैठी थीं। उन्हें डर था—अगर लोग हँसे नहीं तो? अगर नई पीढ़ी उन्हें “आउटडेटेड” कह दे? दूसरी तरफ आयशा को नींद नहीं आ रही थी। मन में एक ही सवाल—“कहीं मैं सास को चोट तो नहीं पहुँचा दूँगी?” राहुल ने पहली बार कैमरा बंद रखा। उसने माँ को यूट्यूब कमेंट्स दिखाए—लोगों की अपनापन भरी बातें। फिर आयशा को माँ की पुरानी डायरी दिखाई, जिसमें लिखा था—“आज मेरी बहू को प्रमोशन मिला, गर्व है।”दोनों की आँखें नम हो गईं। समझ आया कि लड़ाई जो दिखती है, उसके पीछे स्वीकार किए जाने की चाहत है। कमलादेवी को सम्मान चाहिए था, आयशा को अपनापन। उस रात उन्होंने बात नहीं की, बस चाय के कप एक साथ रखे गए। वही खामोशी सबसे बड़ा संवाद थी।
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