रामदीन पढ़ाई के लिए शहर चला गया। वहाँ ऊँची इमारतें थीं, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी थी और समय किसी का इंतज़ार नहीं करता था। उसने इंजीनियरिंग की, नौकरी पाई और धीरे-धीरे शहर की आदतों में ढल गया। गाँव की माटी अब उसके जूतों पर लगने वाली धूल बन गई थी, जिसे वह झाड़ देता था। माँ के हाथ की रोटी, खेतों की हरियाली और पीपल के नीचे की चौपाल अब यादों की एल्बम में सिमट गए थे। जब माँ फोन पर कहती, “बेटा, कब आओगे?”, तो रामदीन कहता, “काम बहुत है, बाद में।” वह सोचता था कि पैसा ही असली ताकत है। उसने फ्लैट खरीदा, कार ली और खुद को सफल मानने लगा। पर भीतर कहीं एक खालीपन था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। त्योहारों पर भी वह गाँव नहीं जाता, क्योंकि उसे लगता था कि वहाँ अब कुछ बचा नहीं है। माटी की महक अब उसे पिछड़ेपन की निशानी लगती थी।
समय अपनी गति से चलता रहा। एक दिन अचानक खबर आई कि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। रामदीन दौड़ता हुआ गाँव पहुँचा। वर्षों बाद जब उसने गाँव की धरती पर कदम रखा, तो कुछ पल के लिए वह ठिठक गया। वही रास्ते, वही खेत, वही पीपल का पेड़—सब वैसे ही थे, जैसे उसने छोड़े थे। पिता की चिता की आग में जब उसने मुखाग्नि दी, तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसे याद आया कि पिता कैसे सुबह-सुबह खेत जाते थे, कैसे मिट्टी को छूकर माथे से लगाते थे। माँ अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। उसने रामदीन का चेहरा देखा और बस इतना कहा, “माटी को भूल गया था क्या, बेटा?” उस एक वाक्य ने रामदीन के भीतर कुछ तोड़ दिया। रात को वह खेतों के पास बैठा रहा। हवा में वही पुरानी महक थी—माटी की महक। उसे एहसास हुआ कि उसने सफलता की दौड़ में अपनी जड़ों को पीछे छोड़ दिया था।
पिता के जाने के बाद रामदीन कुछ दिन गाँव में रुका। उसने देखा कि गाँव के खेत बंजर हो रहे हैं, युवा शहर जा चुके हैं और खेती सिर्फ़ बुज़ुर्गों के भरोसे चल रही है। उसने माँ से पूछा, “सब यूँ ही क्यों उजड़ रहा है?” माँ बोली, “जब माटी से रिश्ता टूटता है, तो ज़मीन भी रूठ जाती है।” यह बात रामदीन के दिल में उतर गई। उसने तय किया कि वह कुछ समय गाँव में रहेगा। उसने आधुनिक खेती के तरीकों के बारे में सोचना शुरू किया, पानी संरक्षण, जैविक खेती और गाँव के युवाओं को वापस लाने के सपने देखे। शुरुआत में लोग हँसे—“शहर का बाबू अब किसान बनेगा?” पर रामदीन डटा रहा। उसने खेतों में काम किया, अपने हाथों से मिट्टी को छुआ। वर्षों बाद उसके हाथ फिर से मिट्टी से सने थे, और उस माटी की महक ने उसके भीतर एक नई ऊर्जा भर दी।
धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगा। सूखे खेतों में हरियाली लौटने लगी। गाँव के कुछ युवा वापस आए, क्योंकि उन्हें काम और सम्मान दोनों मिलने लगे। रामदीन ने शहर की नौकरी छोड़ दी थी, पर उसे अब पछतावा नहीं था। माँ की आँखों में गर्व था। वह कहती, “बेटा, तूने माटी की लाज रख ली।” रामदीन अब समझ चुका था कि असली सफलता सिर्फ़ पैसे में नहीं होती, बल्कि उस संतोष में होती है जो अपनेपन से आता है। गाँव में एक छोटा स्कूल खुला, बच्चों को पढ़ाया जाने लगा और सोनपुर की पहचान बदलने लगी। शहर के लोग अब गाँव देखने आने लगे। रामदीन जब खेतों में खड़ा होता, तो हवा में वही माटी की महक होती—पर अब वह उसे अपनी ताकत लगती थी, कमजोरी नहीं।
समय बीतता गया। रामदीन की कहानी आसपास के गाँवों तक फैल गई। वह अब सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार बन चुका था—कि जड़ों से जुड़कर भी आगे बढ़ा जा सकता है। एक दिन वह पीपल के नीचे बैठा था, वहीं जहाँ कभी बचपन में खेला करता था। उसने मिट्टी उठाई, उसे सूंघा और मुस्कुरा दिया। उसे एहसास हुआ कि माटी की महक कभी जाती नहीं, हम ही उससे दूर चले जाते हैं। अगर हम अपनी मिट्टी को समझ लें, उसका सम्मान करें, तो वह हमें पहचान देती है, स्थिरता देती है और जीवन को अर्थ देती है। रामदीन ने खुद से कहा, “मैं कहीं नहीं गया था, बस अपनी माटी से मिलने देर से लौटा।”
