उधर उस कॉल को रिसीव करने वाली लड़की का नाम था अनाया। वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी, किताबों और बच्चों की मासूम हँसी में अपनी दुनिया ढूँढने वाली। उस रात वह अपनी डायरी में कुछ अधूरे सपने लिख रही थी—शादी का दबाव, समाज की बातें, और अपने भीतर की आज़ादी की चाह। अचानक आया वह फोन उसके लिए भी एक क्षणिक व्यवधान था, लेकिन अजीब बात यह थी कि कॉल कट होने के बाद भी वह आवाज़ उसे याद रह गई। अगले दिन दोपहर में वही नंबर फिर से चमका। इस बार आरव ने हिम्मत करके कहा, “परेशान कर रहा हूँ तो सॉरी… कल गलती से कॉल हो गया था।” अनाया मुस्कुरा दी, “कोई बात नहीं, इंसान हैं, गलती हो जाती है।” बस यहीं से बातें शुरू हुईं—पहले औपचारिक, फिर सहज, और धीरे-धीरे इंतज़ार में बदलती हुई। न चेहरे देखे गए, न नामों के मायने पूछे गए, बस दो अजनबी दिल बिना किसी अपेक्षा के बातें करते चले गए।
दिन बीतते गए और उनकी बातचीत आदत बन गई। आरव ऑफिस से लौटते वक्त उसी कॉल का इंतज़ार करता, और अनाया स्कूल से घर आकर चाय के साथ उसी आवाज़ की। वे अपने डर, असफलताएँ, बचपन की यादें, माँ की डाँट, पापा की चुप्पी—सब बाँटने लगे। यह रिश्ता अजीब था, क्योंकि इसमें कोई दिखावा नहीं था। आरव ने कभी नहीं पूछा कि अनाया कैसी दिखती है, और अनाया ने कभी आरव की सैलरी या स्टेटस नहीं जाना। एक दिन अनाया ने कहा, “पता है, तुमसे बात करके लगता है कि कोई मुझे बिना जज किए सुन रहा है।” आरव ने जवाब दिया, “शायद इसलिए क्योंकि हम एक-दूसरे को नहीं जानते।” लेकिन सच यह था कि वे एक-दूसरे को बहुत गहराई से जानने लगे थे—बिना देखे, बिना छुए। यही वह प्यार था जो शब्दों में नहीं, एहसास में बसता है।
समय के साथ डर भी आने लगा। अनाया के घर में उसकी शादी की बातें तेज़ हो गईं। “लड़का अच्छा है, सरकारी नौकरी है,” माँ कहतीं। अनाया चुप रहती, क्योंकि वह कैसे समझाती कि उसका दिल किसी अनजान आवाज़ के नाम हो चुका है। उधर आरव भी अपने दोस्तों की शादी और रिश्तों को देखकर असमंजस में था। एक रात उसने पूछा, “अगर हम कभी मिले और पसंद न आए तो?” अनाया कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “तो भी यह गलत नहीं होगा, क्योंकि जो हमने महसूस किया, वह सच्चा था।” उस जवाब ने आरव को हिला दिया। उन्होंने तय किया कि सच से भागना नहीं है। एक दिन वे मिलने का फैसला करते हैं—एक साधारण कैफे में, बिना किसी उम्मीद के। जब वे आमने-सामने बैठे, तो कुछ पल की झिझक थी, लेकिन फिर वही अपनापन लौट आया। चेहरा अलग था, लेकिन एहसास वही।
मुलाकात के बाद चीज़ें आसान नहीं हुईं। समाज, परिवार, दूरी—सब सामने खड़े थे। अनाया के परिवार को यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था, “फोन पर प्यार? यह कोई समझदारी नहीं,” पिता ने कहा। आरव के लिए भी नौकरी बदलना और ज़िम्मेदारियाँ लेना आसान नहीं था। कई बार लगा कि शायद यह रिश्ता यहीं खत्म हो जाएगा। लेकिन हर बार वे उस पहली कॉल को याद करते—एक गलत नंबर, जिसने उन्हें सही इंसान से मिलाया। उन्होंने लड़ने का नहीं, समझदारी से आगे बढ़ने का रास्ता चुना। आरव ने अपने करियर को स्थिर किया, अनाया ने अपने परिवार से खुलकर बात की। समय लगा, आँसू गिरे, लेकिन भरोसा नहीं टूटा। धीरे-धीरे परिवार भी समझने लगे कि प्यार दिखावे से नहीं, नीयत से पहचाना जाता है।
आज जब आरव और अनाया साथ हैं, तो उनकी कहानी किसी फिल्मी अंत जैसी नहीं, बल्कि सच्ची ज़िंदगी जैसी है—ज़िम्मेदारियों, समझौतों और सम्मान से भरी हुई। वे जानते हैं कि प्यार सिर्फ सही इंसान से नहीं, सही समय और सही नीयत से भी होता है। कभी-कभी ज़िंदगी हमें गलत रास्तों से सही मंज़िल तक ले जाती है। एक गलत फ़ोन नंबर ने उन्हें यह सिखाया कि दिल की सुनने की हिम्मत हो, तो अजनबी भी अपने हो जाते हैं।
सीख :-
प्यार दिखावे, शक्ल या हालात से नहीं, बल्कि समझ, ईमानदारी और भरोसे से टिकता है। ज़िंदगी में हर गलती गलत नहीं होती—कुछ गलतियाँ हमें सही जगह पहुँचा देती हैं।
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