The Shakespeare of the house - घर का शेक्सपीयर

हर परिवार में कोई न कोई ऐसा सदस्य होता है जो घर की हवा में भी कहानी ढूँढ लेता है, लेकिन शर्मा परिवार में यह जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहे थे—पंडित गोपालदास शर्मा, जिन्हें घर के सभी सदस्य स्नेह और थकान के मिले-जुले भाव से “घर का शेक्सपीयर” कहते थे। गोपालदास जी पेशे से रिटायर्ड क्लर्क थे, पर आत्मा से वे जन्मजात नाटककार थे। उनके लिए जीवन साधारण घटनाओं की श्रृंखला नहीं, बल्कि संवादों, विरामों, आँसुओं और भावनात्मक विस्फोटों से भरा एक अनंत रंगमंच था। अगर दूध उबल कर गिर जाए, तो वे उसे “विश्वासघात की पहली चिंगारी” कहते; अगर सब्ज़ी में नमक कम हो जाए, तो यह “परिवारिक साजिश का मौन प्रमाण” बन जाती। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, हर क्षण उनके लिए एक दृश्य था, हर बातचीत एक संवाद, और हर चुप्पी एक गूढ़ संकेत। मोहल्ले वाले उन्हें साधारण बुज़ुर्ग मानते थे, पर घर के अंदर उनका व्यक्तित्व किसी टीवी सीरियल के मुख्य किरदार से कम नहीं था—जहाँ कैमरा हमेशा उन्हीं पर ज़ूम रहता।




घर की दिनचर्या गोपालदास जी की नाटकीय शैली के कारण पूरी तरह बदल चुकी थी। एक दिन बहू राधा ने बस इतना कहा, “पापा जी, आज दाल थोड़ी पतली हो गई है,” और गोपालदास जी ने तुरंत गहरी साँस लेकर छत की ओर देखा, मानो ईश्वर स्वयं उनके दुःख का साक्षी हो। फिर भारी स्वर में बोले, “यह वही दिन है, जब परिवार के मूल्यों को पानी की तरह बहा दिया गया है।” राधा स्तब्ध रह गई, बेटा अमित मोबाइल छोड़कर उठ खड़ा हुआ, और पोती सिया को लगा शायद कोई बड़ा रहस्य उजागर होने वाला है। इसी तरह, अगर अमित देर से घर आए, तो गोपालदास जी इसे केवल ट्रैफिक नहीं मानते थे—यह उनके अनुसार “नई पीढ़ी की भटकन का स्पष्ट प्रमाण” था। हर छोटी बात को वे ऐसे पेश करते जैसे इतिहास की निर्णायक घड़ी आ गई हो। घर की महिलाएँ धीरे-धीरे चुप रहने लगीं, बच्चे बातें छिपाने लगे, और अमित-राधा अक्सर सोचते कि क्या साधारण जीवन जीना अब इस घर में संभव भी है।

धीरे-धीरे यह नाटकीयता घर की हवा में ज़हर की तरह घुलने लगी। छोटी-सी गलतफहमी भी बड़ा रूप ले लेती, क्योंकि गोपालदास जी हर घटना में संवाद जोड़ देते—कल्पित संवाद, जो किसी ने बोले ही नहीं थे। “मैंने उसकी आँखों में देखा था,” वे कहते, “वहाँ कृतज्ञता नहीं थी, वहाँ विद्रोह था।” सच पूछो तो घर में अब घटनाएँ नहीं, व्याख्याएँ चलती थीं। एक बार सिया ने स्कूल का रिपोर्ट कार्ड छिपा लिया क्योंकि उसे डर था कि उसके 78 प्रतिशत अंक गोपालदास जी की नज़र में “प्रतिभा की हत्या” कहलाएँगे। बच्चे डर में जीने लगे, बहू तनाव में, और बेटा अपराधबोध में—बिना किसी वास्तविक अपराध के। पर गोपालदास जी को यह सब दिखाई नहीं देता था; उन्हें तो बस अपने नाटक का अगला अंक लिखना था। वे हर शाम बालकनी में खड़े होकर ऐसे एकालाप करते, मानो दर्शक तालियाँ बजाने ही वाले हों—पर नीचे खड़े परिवार के सदस्य सिर्फ़ थकान महसूस करते थे।


एक दिन घर में असली संकट आया—अमित की नौकरी चली गई। यह घटना स्वयं में ही भारी थी, लेकिन गोपालदास जी के हाथ लगते ही यह त्रासदी बन गई। उन्होंने इसे “भाग्य का अंतिम प्रहार” घोषित कर दिया और पूरे घर में शोक का माहौल बना दिया, जबकि अमित और राधा अभी समाधान सोच ही रहे थे। गोपालदास जी ने रिश्तेदारों को फोन कर-करके बताया, “मैंने पहले ही कहा था, यह समय आएगा,” मानो वे भविष्यवक्ता हों। पड़ोसियों को भी यह नाटक मुफ्त में देखने को मिला। लेकिन इसी दौरान एक अजीब बात हुई—जब सिया ने अपने दादाजी को चुपचाप रोते देखा। वह पहली बार था जब शेक्सपीयर बिना संवाद के सामने आया। सिया ने मासूमियत से पूछा, “दादाजी, आप हर बात को इतना बड़ा क्यों बना देते हो?” यह सवाल किसी संवाद की तरह नहीं, बल्कि आईने की तरह था। गोपालदास जी पहली बार निरुत्तर हुए। उन्हें एहसास हुआ कि उनके शब्दों ने परिवार को जोड़ा नहीं, बल्कि डराया है।

उस रात गोपालदास जी सो नहीं पाए। जीवन का पूरा नाटक उनकी आँखों के सामने चलने लगा—हर दृश्य, हर संवाद, हर आह। उन्हें समझ में आने लगा कि उन्होंने स्वयं को इतना बड़ा पात्र बना लिया कि बाकी किरदारों को इंसान ही नहीं रहने दिया। सुबह उन्होंने सबको बुलाया। घर में सन्नाटा था, सब किसी नए दृश्य की आशंका में थे। लेकिन इस बार गोपालदास जी ने कोई भारी संवाद नहीं बोला। उन्होंने बस कहा, “मैंने जीवन को नाटक समझ लिया, पर भूल गया कि नाटक में तालियाँ मिलती हैं, परिवार में नहीं।” उनकी आवाज़ काँप रही थी। पहली बार शब्दों में नहीं, भावनाओं में सच्चाई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि उनका डर, उनकी असुरक्षा, उनके अकेलेपन ने उन्हें ऐसा बना दिया। परिवार के सदस्य चुपचाप सुनते रहे—और पहली बार यह चुप्पी बोझ नहीं थी।


समय के साथ घर का माहौल बदला। गोपालदास जी अब भी कहानियाँ सुनाते थे, पर वे अब डराने वाली नहीं, जोड़ने वाली होती थीं। उन्होंने सीखा कि हर घटना को नाटकीय बनाना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी हो सकती है। अमित को नई नौकरी मिल गई, राधा ने फिर से खुलकर हँसना शुरू किया, और सिया अब रिपोर्ट कार्ड छिपाती नहीं थी। “घर का शेक्सपीयर” अब भी घर में था, लेकिन मंच बदल चुका था—अब वह निर्देशक नहीं, मार्गदर्शक था।

सीख :-परिवार रंगमंच नहीं होता। शब्दों का उपयोग अगर डर पैदा करे, तो वह कला नहीं, बोझ बन जाता है। सच्ची समझदारी यह जानने में है कि कब संवाद ज़रूरी हैं और कब मौन। जीवन को नाटक बनाना आसान है, लेकिन उसे सहज और प्रेमपूर्ण बनाना ही असली कला है।