The Last Station - अंतिम स्टेशन

आधी रात का समय था। ठंडी हवा पुराने, जर्जर स्टेशन की टूटी खिड़कियों से सीटी बजाती हुई भीतर आ रही थी। प्लेटफॉर्म पर टिमटिमाती पीली बत्तियाँ ऐसे जल रही थीं मानो वर्षों से किसी ने उन्हें बदला ही न हो। करण तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरकर प्लेटफॉर्म पर पहुँचा। उसने घड़ी की ओर देखा—ठीक 12:00। उसे आखिरी ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन अजीब बात यह थी कि स्टेशन पर सन्नाटा पसरा था। न टिकट काउंटर पर कोई क्लर्क, न चायवाले की आवाज़, न ही यात्रियों की भीड़। सिर्फ़ हवा और दूर कहीं किसी ढीले टिन की चादर की खड़खड़ाहट। करण को लगा शायद वह समय से पहले आ गया है। उसने फिर घड़ी देखी—अब भी 12:00। मिनट की सुई जैसे जम चुकी थी। उसके मोबाइल में भी सिग्नल नहीं था, और बैटरी अचानक बंद हो गई। उसे बेचैनी होने लगी। वह खुद को समझाने लगा कि शायद यह सब उसका भ्रम है, थकान का असर है। पर भीतर कहीं एक अजीब-सा डर जन्म लेने लगा था—क्या यह सचमुच आखिरी ट्रेन का इंतज़ार है, या कुछ और?



कुछ देर बाद दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी। करण ने राहत की साँस ली। अंधेरे को चीरती हुई एक पुरानी, जंग लगी ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। उसके डिब्बों पर धूल जमी थी और खिड़कियों के शीशे धुँधले थे। दरवाज़ा अपने आप खुल गया। करण ने हिम्मत जुटाकर भीतर कदम रखा। अंदर सन्नाटा और भी गहरा था। सीटों पर बैठे यात्री अजीब तरह से शांत थे—उनके चेहरे पीले, आँखें खाली, और शरीर बिल्कुल स्थिर। किसी ने उसकी ओर देखा भी नहीं। उसे अपनी सीट खोजनी थी। टिकट उसके हाथ में नहीं था, फिर भी उसे एक अनजानी ताकत सीट नंबर की ओर खींच रही थी। वह रुका—सीट नंबर 69। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। यह उसकी जन्मतिथि थी। क्या यह महज़ संयोग था? वह बैठ गया, लेकिन उसके मन में सवालों का तूफान था। खिड़की पर धुंध के बीच उसे कुछ लिखा दिखा। उसने हाथ से पोंछा—उसका अपना नाम। करण शर्मा। उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।


ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। बाहर का दृश्य धुंध में गायब हो गया। करण ने इधर-उधर देखा। एक बुज़ुर्ग महिला सामने बैठी थी, उसकी आँखें बंद थीं जैसे वह सो रही हो। बगल में एक युवक था, जिसके कपड़े फटे हुए थे और माथे पर खून के निशान सूखे हुए थे। करण ने उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। तभी डिब्बे के अंत से एक ठंडी हवा का झोंका आया और लाइट्स टिमटिमाने लगीं। एक धीमी आवाज़ उसके कानों में गूँजी—“यह अधूरी इच्छाओं की यात्रा है।” उसका दिल बैठ गया। उसे अचानक अपने जीवन के अधूरे सपने याद आने लगे—माँ के लिए नया घर, पिता से की गई अधूरी बातचीत, और वह लड़की जिससे वह अपने मन की बात कभी कह नहीं पाया। उसे एहसास हुआ कि इस ट्रेन में बैठे सभी लोग शायद वे हैं, जिनकी मौत अचानक हुई और जिनकी इच्छाएँ अधूरी रह गईं। क्या वह भी उन्हीं में से एक है?


करण ने घबराकर दरवाज़े की ओर दौड़ लगाई। उसने हैंडल घुमाया, पर दरवाज़ा नहीं खुला। उसने खिड़की तोड़ने की कोशिश की, लेकिन शीशा पत्थर जैसा सख्त था। ट्रेन अब एक गहरे अंधेरे सुरंग में प्रवेश कर चुकी थी। बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक उसके दिमाग में एक चमकती हुई याद कौंधी—आज शाम की घटना। बारिश में फिसलती सड़क, तेज़ रफ्तार ट्रक, और एक तेज़ टक्कर। उसके बाद… सन्नाटा। क्या वह सच में मर चुका है? उसने सिर पकड़ लिया। “नहीं, यह सच नहीं हो सकता,” वह बुदबुदाया। लेकिन हर याद उसे उसी निष्कर्ष तक ले जा रही थी। उसका शरीर काँप रहा था। वह खुद से लड़ रहा था—इनकार और स्वीकार के बीच। तभी डिब्बे के अंत में खड़ा एक काला साया उसकी ओर बढ़ने लगा।

वह साया धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ। वह ट्रेन का कंडक्टर था—लेकिन उसका चेहरा कंकाल का था, आँखों की जगह गहरी खाली गुफाएँ। उसके हाथ में एक पुरानी लालटेन थी, जिसकी लौ नीली चमक रही थी। वह करण के सामने आकर रुका। उसकी आवाज़ भारी और गूँजती हुई थी—“यह आखिरी स्टेशन है, करण। तुम्हारा इंतज़ार था।” करण के भीतर की सारी ताकत जैसे खत्म हो गई। ट्रेन सुरंग से निकलकर एक भूतिया स्टेशन पर आकर रुकी। बाहर धुंध में लिपटा प्लेटफॉर्म था। उसने खिड़की से देखा—उसका परिवार। उसकी माँ रो रही थी, पिता चुपचाप खड़े थे, और कुछ लोग उसकी अर्थी उठाए हुए थे। उसने खुद को सफेद कपड़े में लिपटा देखा। वह दृश्य उसकी आत्मा को झकझोर गया। अब कोई संदेह नहीं बचा था। वह सचमुच मर चुका था। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन वे आँसू किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे।


धीरे-धीरे करण के भीतर शांति उतरने लगी। उसने अपनी सारी अधूरी इच्छाओं को याद किया और समझा कि जीवन कितना अनिश्चित है। जो कुछ वह टालता रहा, जो बातें वह कह नहीं पाया, जो सपने वह कल पर छोड़ता रहा—वे सब यहीं छूट गए। उसने गहरी साँस ली और पहली बार स्वीकार किया—“हाँ, मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ।” जैसे ही उसने यह स्वीकार किया, ट्रेन की दीवारें धुंध में बदलने लगीं। कंडक्टर का साया मुस्कराया और गायब हो गया। स्टेशन, ट्रेन, और सारे यात्री प्रकाश में विलीन होने लगे। करण की आत्मा हल्की हो गई, जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो। वह एक उज्ज्वल रोशनी की ओर बढ़ा और उसमें समा गया। अगले ही पल स्टेशन फिर से सुनसान था, पुराना और जर्जर। घड़ी अब भी 12:00 पर अटकी थी। और हवा में एक अनकहा संदेश गूँज रहा था—हर अधूरी इच्छा का एक अंतिम स्टेशन होता है।

कहानी की सीख :-

जीवन अनिश्चित है। हमें अपने प्रियजनों से प्यार और अपनी इच्छाओं को कल पर नहीं टालना चाहिए। जो कहना है, आज कहें। जो करना है, आज करें। क्योंकि किसी को नहीं पता कि उसकी “आखिरी ट्रेन” कब आ जाए।