स्कूल के बाहर कूड़े का ढेर – समस्या की शुरुआत
शहर के बाहरी हिस्से में स्थित सरस्वती विद्या निकेतन एक साधारण सा सरकारी स्कूल था, लेकिन उसके बाहर का नज़ारा बेहद डरावना था। स्कूल के मुख्य द्वार के ठीक सामने कूड़े का एक विशाल ढेर लगा रहता था। प्लास्टिक की थैलियाँ, सड़ी-गली सब्ज़ियाँ, टूटे काँच, बदबूदार कीचड़ और आवारा जानवर—सब कुछ मिलकर उस जगह को नरक बना देते थे। सुबह-सुबह जब बच्चे स्कूल आते, तो नाक पर रूमाल रखकर तेज़ी से अंदर घुसते। कई बार छोटे बच्चे फिसल जाते, उनके कपड़े गंदे हो जाते और कुछ को तो उल्टियाँ भी हो जाती थीं। बारिश के दिनों में हालात और भी खराब हो जाते, क्योंकि कूड़े से निकला गंदा पानी पूरे रास्ते में फैल जाता था।शिक्षक कई बार नगर निगम में शिकायत कर चुके थे, लेकिन हर बार सिर्फ़ आश्वासन मिलता—“अगले हफ्ते सफाई हो जाएगी।” अगले हफ्ते कभी नहीं आता। धीरे-धीरे लोग इस गंदगी के आदी हो गए थे। मोहल्ले वालों ने भी मान लिया था कि “सरकारी काम है, कुछ नहीं होगा।” लेकिन इस गंदगी का सबसे ज़्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा था—उनके स्वास्थ्य पर, उनके मन पर और उनके भविष्य पर। बच्चे रोज़ यही सोचते कि क्या उनका स्कूल इसी बदबू और गंदगी के बीच ही पहचाना जाएगा?
इसी स्कूल की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली अनन्या नाम की लड़की इस हालात से सबसे ज़्यादा परेशान थी। वह पढ़ाई में अच्छी थी और बहुत संवेदनशील भी। एक दिन उसने देखा कि उसकी छोटी बहन, जो पहली कक्षा में पढ़ती थी, कूड़े के पास से गुजरते समय गिर गई और उसका बैग पूरी तरह गंदा हो गया। उस दिन अनन्या के मन में कुछ टूट गया। उसने ठान लिया कि अब वह चुप नहीं बैठेगी। समस्या चाहे जितनी बड़ी हो, शुरुआत तो करनी ही होगी।
छात्रों की टीम बनती है – सोच से संकल्प तक
अगले ही दिन अनन्या ने अपनी क्लास में इस विषय पर बात शुरू की। पहले तो कुछ बच्चों ने हँसकर टाल दिया—“हम क्या कर लेंगे?” लेकिन अनन्या ने हार नहीं मानी। उसने धीरे-धीरे सबको समझाया कि अगर हम रोज़ इस गंदगी से परेशान होते हैं, तो हमें ही कुछ करना होगा। सिर्फ़ शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा। उसने विज्ञान के शिक्षक शर्मा सर से भी बात की। शर्मा सर ने बच्चों की बात ध्यान से सुनी और पहली बार किसी शिक्षक ने कहा “अगर तुम सब साथ हो, तो मैं भी तुम्हारे साथ हूँ।”इसके बाद एक छोटी सी मीटिंग बुलाई गई। पाँच बच्चों से शुरू हुई यह मीटिंग धीरे-धीरे पंद्रह और फिर तीस बच्चों तक पहुँच गई। बच्चों ने अपनी टीम का नाम रखा—“हरित प्रहरी”। इस टीम का उद्देश्य था—अपने स्कूल और आस-पास के इलाके को स्वच्छ बनाना और लोगों को प्रदूषण के खिलाफ़ जागरूक करना। बच्चों ने तय किया कि वे सिर्फ़ सफाई नहीं करेंगे, बल्कि लोगों की सोच बदलने की कोशिश भी करेंगे।
उन्होंने पोस्टर बनाए—“कूड़ा कूड़ेदान में डालें”, “स्वच्छता से ही स्वस्थ भारत”, “आज नहीं तो कभी नहीं।” बच्चों ने अपने-अपने घरों में भी इस बारे में बात की। कुछ माता-पिता पहले डर गए—“कूड़े में कौन जाएगा?” लेकिन जब बच्चों ने अपने इरादे समझाए, तो कई अभिभावकों ने उनका साथ देने का वादा किया।
यह सिर्फ़ एक टीम नहीं थी, यह एक सोच थी—कि बदलाव बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है। इन बच्चों ने साबित कर दिया कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन सोच बड़ी होनी चाहिए।
क्लीनअप ड्राइव – मेहनत, पसीना और उम्मीद
रविवार का दिन तय किया गया। सुबह सात बजे स्कूल के बाहर “हरित प्रहरी” के सभी सदस्य जमा हुए। हाथों में दस्ताने, मुँह पर मास्क, हाथों में झाड़ू और कूड़े की बोरियाँ। शुरुआत में कूड़े का ढेर देखकर कई बच्चों के कदम रुक गए। बदबू इतनी तेज़ थी कि आँखों से पानी आ रहा था। लेकिन अनन्या ने सबसे पहले झाड़ू उठाई। उसे देखकर बाकी बच्चे भी आगे बढ़े।
पहले घंटे में सिर्फ़ कूड़ा उठाने में ही दम निकल गया। प्लास्टिक, काँच, गीला कचरा—सब कुछ अलग-अलग किया गया। कुछ बच्चों ने गड्ढे खोदकर गीले कचरे को अलग किया ताकि बाद में खाद बनाई जा सके। पसीने से कपड़े भीग चुके थे, हाथों में छाले पड़ने लगे थे, लेकिन किसी ने रुकने की बात नहीं की।
धीरे-धीरे आस-पास के लोग रुककर देखने लगे। पहले कुछ ने मज़ाक उड़ाया—“सरकारी काम बच्चे कर रहे हैं!” लेकिन जब घंटों की मेहनत के बाद कूड़े का ढेर कम होने लगा, तो लोगों का रवैया बदलने लगा। एक दुकानदार ने बच्चों के लिए पानी लाकर दिया। एक बुज़ुर्ग महिला ने घर से नींबू पानी भेजा। कुछ युवाओं ने खुद आगे बढ़कर मदद शुरू कर दी।
यह सिर्फ़ सफाई नहीं थी, यह एक आंदोलन बनता जा रहा था। बच्चों की आँखों में थकान थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा चमक थी—कुछ बदल देने की चमक।
लोग जुड़ते हैं, मीडिया आती है – आंदोलन की गूँज
दोपहर तक पूरा इलाका बदल चुका था। जहाँ सुबह बदबू थी, वहाँ अब खुली ज़मीन दिख रही थी। किसी ने इस पूरी क्लीनअप ड्राइव का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। देखते ही देखते वह वीडियो वायरल हो गया—“स्कूल के बच्चों ने किया कमाल!”
शाम तक स्थानीय अख़बार और न्यूज़ चैनल वहाँ पहुँच गए। कैमरे बच्चों की मेहनत को रिकॉर्ड कर रहे थे। रिपोर्टर अनन्या से पूछ रहे थे—“इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?” अनन्या ने बस इतना कहा—“हम रोज़ इसी गंदगी से गुजरते हैं, तो हमने सोचा कि शिकायत से बेहतर है, सफाई कर ली जाए।”
मीडिया कवरेज का असर तुरंत दिखा। अगले दिन नगर निगम के अधिकारी खुद मौके पर आए। पहली बार किसी अधिकारी ने बच्चों से कहा—“तुम लोगों ने हमें आईना दिखाया है।” मोहल्ले के लोग भी अब पूरी तरह साथ खड़े थे।
यह कहानी अब सिर्फ़ स्कूल की नहीं रही थी, यह पूरे शहर की कहानी बन चुकी थी। बच्चों ने साबित कर दिया था कि अगर नीयत साफ़ हो, तो असर भी साफ़ दिखता है।
नगर निगम की कार्रवाई – स्थायी समाधान
मीडिया दबाव और जनता की जागरूकता के बाद नगर निगम ने ठोस कदम उठाए। स्कूल के बाहर बड़े-बड़े स्थायी कूड़ेदान लगाए गए। कूड़ा उठाने के लिए रोज़ाना गाड़ी आने लगी। “यहाँ कूड़ा फेंकना मना है” के बोर्ड लगाए गए और सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए ताकि दोबारा कोई लापरवाही न हो।नगर निगम ने बच्चों की टीम को बुलाकर औपचारिक रूप से धन्यवाद दिया। उन्हें स्वच्छता अभियान का ब्रांड एम्बेसडर घोषित किया गया। बच्चों को पहली बार महसूस हुआ कि उनकी आवाज़ सुनी जा रही है।अब बच्चे सिर्फ़ अपने स्कूल तक सीमित नहीं रहे। वे दूसरे इलाकों में भी जाकर लोगों को जागरूक करने लगे। “हरित प्रहरी” अब एक मिसाल बन चुका था।
सम्मान, बदलाव और नई पीढ़ी की उम्मीद
कुछ महीनों बाद वही स्कूल, वही रास्ता—लेकिन नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था। हरे पौधे, साफ़ सड़क, दीवारों पर स्वच्छता के संदेश। बच्चे गर्व से सिर उठाकर स्कूल आते। वार्षिक समारोह में पूरे शहर के सामने बच्चों को सम्मानित किया गया।अनन्या को मंच पर बुलाकर कहा गया—“आज का असली हीरो।” लेकिन अनन्या जानती थी कि यह जीत अकेले उसकी नहीं, बल्कि हर उस बच्चे की थी जिसने झाड़ू उठाने से शर्म नहीं की।इस पहल ने एक बात साफ़ कर दी—अगर बच्चे ठान लें, तो समाज बदल सकता है। प्रदूषण सिर्फ़ सरकार की समस्या नहीं, हम सबकी ज़िम्मेदारी है।कहानी की सीख :-
छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
अगर हम समस्या देखकर चुप न रहें और मिलकर समाधान की कोशिश करें, तो कोई भी गंदगी—चाहे वह सड़कों की हो या सोच की—हमेशा के लिए साफ़ की जा सकती है।
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