दौड़ के बाद उसके सबसे अच्छे दोस्त राघव ने उसे बधाई दी, लेकिन उसकी आँखों में संदेह की हल्की-सी परछाई थी। राघव भी तेज धावक था और वह जानता था कि आखिरी मोड़ तक वह अर्जुन के साथ ही था। उसने धीरे से पूछा, “अर्जुन, तुम अचानक इतने आगे कैसे निकल गए?” अर्जुन के गले में शब्द अटक गए। एक पल के लिए वह सच बता सकता था, लेकिन उसने हिचकिचाकर कहा, “मैंने बस पूरी ताकत लगा दी।” राघव चुप हो गया, पर उसका मन आश्वस्त नहीं हुआ। गाँव में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ बच्चों ने कहा कि उन्होंने अर्जुन को कच्चे रास्ते की तरफ जाते देखा था। अर्जुन के कानों तक ये बातें पहुँचीं, लेकिन वह हर बार खुद को समझा लेता—“अब तो जीत मिल गई है, सब ठीक हो जाएगा।” पर भीतर कहीं एक आवाज उसे कचोटती रही। झूठ का बीज बो दिया गया था और अब वह धीरे-धीरे उसके मन में उगने लगा था। राघव उससे थोड़ा दूर रहने लगा। वह पहले की तरह खुलकर हँसता नहीं था। अर्जुन को यह दूरी चुभती थी, लेकिन अपने झूठ को स्वीकार करने का साहस उसमें नहीं था। जीत की चमक के पीछे उसका आत्मविश्वास फीका पड़ने लगा।
उस रात अर्जुन को नींद नहीं आई। बिस्तर पर लेटे-लेटे वह छत को देखता रहा। बाहर चाँदनी फैली थी, लेकिन उसके मन में अंधेरा था। देर रात उसे एक सपना आया। उसने देखा कि वह उसी पगडंडी पर दौड़ रहा है, लेकिन उसके पैरों में भारी जंजीरें बंधी हैं। सामने उसके पिता खड़े हैं, मुस्कुरा रहे हैं, पर उनकी आँखों में निराशा है। पिता ने कहा, “अर्जुन, दौड़ में आगे निकलना आसान है, लेकिन अपने आप से आगे निकलना मुश्किल। क्या तुम सच में जीत गए हो?” अर्जुन चौंककर उठ बैठा। उसके माथे पर पसीना था। उसे पिता की बातें याद आने लगीं—ईमानदारी, मेहनत, सच्चाई। उसने सोचा, “मैंने सबको नहीं, खुद को धोखा दिया है।” सुबह होने तक वह करवटें बदलता रहा। झूठ का बोझ उसके सीने पर पत्थर की तरह रखा था। उसे लगा कि ट्रॉफी अब सोने की नहीं, बल्कि काँटों की बनी है। वह सोचता रहा कि अगर वह सच बता दे तो क्या होगा—लोग हँसेंगे, निराश होंगे, शायद उसे डाँट पड़े। लेकिन अगर वह चुप रहा, तो यह बोझ उसे हर दिन सताएगा।
अगले दिन इनाम बाँटने की रस्म थी। पूरा गाँव पंचायत के आँगन में इकट्ठा हुआ। रंग-बिरंगे झंडे लगाए गए थे, ढोलक बज रही थी, और बच्चे उत्साह से उछल रहे थे। सरपंच मंच पर बैठे थे और विजेताओं के नाम पुकारे जा रहे थे। जब अर्जुन का नाम पुकारा गया, तो तालियाँ गूँज उठीं। वह मंच की ओर बढ़ा, लेकिन उसके कदम भारी थे। उसके हाथ काँप रहे थे। ट्रॉफी उसकी ओर बढ़ाई गई। वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी आँखों में खुशी नहीं थी। भीड़ में उसे राघव दिखा—शांत, गंभीर। अर्जुन के भीतर संघर्ष चल रहा था। एक आवाज कहती, “चुप रहो, सब खत्म हो जाएगा।” दूसरी आवाज कहती, “सच बोलो, तभी मन शांत होगा।” सरपंच ने कहा, “अर्जुन हमारे गाँव का गौरव है।” यह सुनकर अर्जुन का दिल धड़क उठा। क्या वह इस सम्मान के योग्य था? उसके पिता का चेहरा फिर से आँखों के सामने उभरा। उसी क्षण उसने निर्णय लिया।
अर्जुन ने माइक पकड़ लिया। उसकी आवाज पहले धीमी थी, फिर धीरे-धीरे स्पष्ट हो गई। “मैं कुछ कहना चाहता हूँ,” उसने कहा। भीड़ शांत हो गई। “मैंने दौड़ में शॉर्टकट लिया था। मैं इस ट्रॉफी का हकदार नहीं हूँ।” एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। हवा भी जैसे रुक गई। फिर हलचल शुरू हुई—कुछ लोग हैरान थे, कुछ निराश। अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने ट्रॉफी सरपंच को लौटा दी। “मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी गलती सुधारना चाहता हूँ।” राघव आगे बढ़ा और अर्जुन को गले लगा लिया। उसने कहा, “सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए, और तुमने वह हिम्मत दिखाई।” सरपंच ने गंभीरता से कहा, “गलती करना बुरा नहीं, उसे छिपाना बुरा है। अर्जुन ने आज सच्चाई का सम्मान किया है।” पंचायत ने फैसला किया कि दौड़ दोबारा कराई जाएगी। उस क्षण अर्जुन के मन से एक बड़ा बोझ उतर गया। उसे लगा जैसे वह पहली बार सच में हल्का महसूस कर रहा हो।
कुछ दिनों बाद दोबारा दौड़ आयोजित हुई। इस बार अर्जुन ने और भी मेहनत की। उसने खुद से वादा किया कि चाहे जो हो, वह केवल ईमानदारी से दौड़ेगा। प्रतियोगिता के दिन जब सीटी बजी, तो वह पूरी ताकत से दौड़ा। हर कदम के साथ उसे लगा कि उसके भीतर नई ऊर्जा है—सच्चाई की ऊर्जा। आखिरी मोड़ पर उसने देखा कि राघव उसके बराबर है। दोनों ने पूरी शक्ति लगा दी। अंत में अर्जुन थोड़े अंतर से आगे निकल गया। जब उसने फिनिश लाइन पार की, तो तालियाँ पहले से भी ज्यादा गूँजीं। इस बार उसकी आँखों में सच्ची खुशी थी। ट्रॉफी लेते समय उसके हाथ स्थिर थे, और दिल गर्व से भरा था। राघव ने मुस्कुराकर कहा, “अब तुम सच में विजेता हो।” अर्जुन ने आसमान की ओर देखा, मानो अपने पिता को धन्यवाद कह रहा हो। उसे समझ आ गया कि सच्चाई की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंत में वही सबसे बड़ी जीत देती है।
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