Two Earthen Lamps - दो मिट्टी के दीपक

गाँव के सालाना मेले में उस दिन जैसे रंगों की बारिश हो रही थी। चारों ओर हल्दी, गुलाल और गुब्बारों की खुशबू घुली हुई थी। बच्चों की हँसी, ढोल की थाप और खिलौनों की खनक पूरे वातावरण को जीवंत बना रही थी। इसी मेले में पहली बार राजू और श्याम की मुलाकात हुई। दोनों अलग-अलग दिशाओं से आए थे, लेकिन उनकी नजरें एक ही दुकान पर जाकर ठहर गईं—मिट्टी के दीपकों की दुकान। वह बूढ़ा कुम्हार अपनी सादी धोती और हल्की मुस्कान के साथ दीपक सजा रहा था। दीपकों पर लाल, पीले और नीले रंगों की महीन कारीगरी थी, मानो हर दीपक अपने भीतर एक छोटी सी दुनिया समेटे बैठा हो। राजू ने एक दीपक उठाकर उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखों में चमक थी। “देखो, यह कितना सुंदर है,” उसने बगल में खड़े श्याम से कहा। श्याम भी उसी दीपक को देख रहा था। उसने मुस्कुराकर जवाब दिया, “हाँ, जैसे इसमें कोई कहानी छिपी हो।” दोनों की बातचीत धीरे-धीरे बढ़ी और पता चला कि दोनों को बचपन से ही मिट्टी के दीपकों से खास लगाव है। राजू ने बताया कि उसके पिता भी कभी कुम्हार थे, जबकि श्याम ने कहा कि उसके पिता भी इसी कला में निपुण हैं। दोनों के चेहरे पर एक अनजाना अपनापन उभर आया। मेले की भीड़ में दो अजनबी लड़कों की यह मुलाकात किसी संयोग से कम नहीं थी। दीपकों की चमक जैसे उनके दिलों को जोड़ रही थी। वे दोनों उस बूढ़े कुम्हार की बातें सुनने लगे, जो बता रहा था कि मिट्टी को आकार देना सिर्फ कला नहीं, बल्कि धैर्य और प्रेम का काम है। उसी क्षण दोनों के मन में एक प्रश्न उठा—क्या उनके पिता भी कभी ऐसे ही किसी कुम्हार से सीखे होंगे? यह सवाल आगे चलकर एक बड़े रहस्य का द्वार खोलने वाला था।



कुछ दिनों बाद राजू और श्याम की दोस्ती गहरी हो गई। वे अक्सर शाम को तालाब के किनारे बैठकर बातें करते। एक दिन बातचीत के दौरान श्याम ने बताया कि उसके पिता ने एक मशहूर कुम्हार से शिक्षा ली थी, जिनका नाम था हरिदास काका। यह नाम सुनते ही राजू चौंक गया। “मेरे पिता भी हरिदास काका के शिष्य थे!” उसने उत्साह से कहा। दोनों के लिए यह एक बड़ा खुलासा था। उन्हें समझ आया कि उनके पिता कभी एक ही गुरु के सान्निध्य में मिट्टी को आकार देना सीखते थे। उन्होंने घर जाकर अपने-अपने पिता से इस बारे में पूछा। राजू के पिता की आँखों में पुरानी यादों की चमक आ गई। उन्होंने बताया कि हरिदास काका सख्त मगर स्नेही गुरु थे। उनके यहाँ शिष्य केवल कला ही नहीं, जीवन के मूल्य भी सीखते थे। उधर श्याम के पिता ने भी यही कहानी सुनाई। दोनों परिवारों का अतीत एक ही धागे से बंधा था, मगर किसी कारणवश वे वर्षों से एक-दूसरे से दूर थे। राजू और श्याम को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनके पिता कभी घनिष्ठ मित्र थे। उन्होंने साथ-साथ मिट्टी गूंथी, चाक चलाया और दीपक बनाए। लेकिन समय के साथ कुछ ऐसा हुआ कि दोनों परिवारों के बीच दूरी आ गई। यह दूरी अब एक पुराने जख्म की तरह थी, जिसे किसी ने भरने की कोशिश नहीं की थी।


एक शाम राजू ने अपने पिता से पूछा, “आप और श्याम के पिता अलग क्यों हो गए?” यह सवाल सुनते ही उसके पिता का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने गहरी साँस ली और बताया कि कई साल पहले दिवाली के अवसर पर गाँव में सबसे सुंदर दीपक जलाने की प्रतियोगिता हुई थी। उस समय राजू के पिता और श्याम के पिता दोनों ने भाग लिया था। दोनों ने अपनी-अपनी कला का श्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। परिणाम घोषित होने पर श्याम के पिता विजेता बने। गाँव वालों ने उनके दीपकों की प्रशंसा की। लेकिन कुछ लोगों ने अफवाह फैला दी कि उन्होंने कोई विशेष तकनीक चुराई थी। यह बात राजू के पिता को बहुत बुरी लगी। उन्हें लगा कि उनके साथ अन्याय हुआ है। धीरे-धीरे यह प्रतिस्पर्धा मनमुटाव में बदल गई। दोनों परिवारों के बीच खटास बढ़ती गई और अंततः वे अलग हो गए। यह सुनकर राजू के मन में गुस्सा भर गया। उसे लगा कि उसके पिता के साथ अन्याय हुआ था। उसने श्याम से दूरी बना ली। श्याम को समझ नहीं आया कि अचानक राजू बदल क्यों गया। उसे जब सच्चाई का पता चला, तो वह दुखी हो गया। उसने तय किया कि वह इस पुराने विवाद को खत्म करने की कोशिश करेगा।


राजू के मन में आक्रोश था। उसे लगता था कि श्याम के पिता की वजह से उसका परिवार प्रतियोगिता हार गया। उसने श्याम से बात करना बंद कर दिया। लेकिन श्याम हार मानने वाला नहीं था। उसने एक दिन राजू के घर जाकर कहा, “अगर हमारे पिता के बीच गलतफहमी हुई थी, तो हम उसे क्यों आगे बढ़ाएँ? हम दोस्त हैं, और हमें इसे खत्म करना चाहिए।” राजू चुप रहा। उसके मन में द्वंद्व चल रहा था। एक ओर पिता के सम्मान का सवाल था, दूसरी ओर दोस्ती की सच्चाई। श्याम ने सुझाव दिया कि इस बार दिवाली पर वे दोनों मिलकर दीपक बनाएँ और प्रतियोगिता में भाग लें। यह सुनकर राजू पहले तो हिचकिचाया, लेकिन फिर उसने सोचा कि शायद यही मौका है सब कुछ बदलने का। दोनों ने मिलकर मिट्टी इकट्ठी की, चाक चलाया और नए-नए डिज़ाइन बनाए। वे दिन-रात मेहनत करते रहे। इस दौरान दोनों परिवारों के बड़े भी धीरे-धीरे एक-दूसरे से मिलने लगे। पुरानी यादें ताजा होने लगीं। मन का बोझ हल्का होने लगा।


दिवाली की रात आई। गाँव का चौक दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था। राजू और श्याम ने मिलकर हज़ारों दीपक सजाए। हर दीपक में उनकी मेहनत और दोस्ती की चमक थी। जब सभी दीपक एक साथ जले, तो ऐसा लगा जैसे पूरा गाँव सितारों से भर गया हो। लोगों ने उनकी एकता की प्रशंसा की। इस बार कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी, केवल सहयोग था। दोनों परिवारों के पिता एक-दूसरे के पास आए। आँखों में आँसू थे। उन्होंने एक-दूसरे से हाथ मिलाया और पुरानी गलतफहमियों को भुला दिया।


उस रात गाँव में केवल दीपक ही नहीं, दिल भी रोशन हुए। राजू और श्याम ने साबित कर दिया कि सच्ची दोस्ती और सहयोग से पुरानी दुश्मनी मिटाई जा सकती है। दोनों परिवार एक साथ बैठकर मिठाइयाँ बाँटने लगे। हरिदास काका की शिक्षा फिर से जीवित हो उठी—मिट्टी को आकार देने से पहले दिल को आकार देना जरूरी है। दीपकों की लौ हवा में झिलमिला रही थी, जैसे कह रही हो कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, मिलकर जलाया गया एक दीपक भी उसे मिटा सकता है।

कहानी की सीख :-

पुरानी गलतफहमियों को संवाद और सहयोग से दूर किया जा सकता है।

प्रतिस्पर्धा से बेहतर है सहयोग।

सच्ची दोस्ती परिवारों को भी जोड़ सकती है।

ईर्ष्या और अहंकार से रिश्ते टूटते हैं, जबकि क्षमा और प्रेम से रिश्ते बनते हैं।

एकता की रोशनी हर अंधकार को मिटा सकती है।